‘‘ जन्म दिन 30 अगस्त पर विशेष’’
गीतकार शैलेन्द्र भारत के सच्चे रत्न थे
आलेख- के पी मौर्य, महासचिव, शैलेन्द्र सांस्कृतिक केन्द्र
फिल्मी दुनिया के प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र के लिखे गीतों को सुनकर भारत ही नहीं बल्कि विश्व में आज भी लोग मस्त होकर झूमते हुए दिखाई देते हैं। उनके गीत लोगों के दिलो-दिमाग पर आज भी अपनी स्पष्ट छाप छोड़ जाते हैं। एक दलित परिवार में जन्में गीतकार शैलेन्द्र जी को प्रसिद्ध अभिनेता श्री राजकपूर उनकी प्रतिभा और गीतों से प्रभावित होकर उनको फिल्मी दुनिया में लेकर आए। शैलेन्द्र जी ने अपनी प्रतिभा और योग्यता के बल पर अपनी गीत लिखने की शैली से न सिर्फ श्री राजकपूर को ख्याति दिलाई बल्कि अपने गीतों के माध्यम से भारत की छबि को दुनिया में उभारने में क्रांतिकारी भूमिका निभाई। फिल्मी दुनिया में उनकी मंडली में अभिनेता राजकपूर, संगीतकार शंकर जयकिषन और गायक मुकेष कुमार आदि थे।
शैलेन्द्र का असली नाम शंकर सिंह ‘शैलेन्द्र’ था। उनका जन्म 30 अगस्त, 1923, रावल पिंडी पाकिस्तान में एक दलित परिवार में हुआ था। आपने 171 हिन्दी फिल्मों एवं 6 भोजपुरी फिल्मों में लगभग 800 फिल्मी गीत लिखे। आपने जिन लोकप्रिय फिल्मों में के लिए गीत लिखे उनमें प्रमुख हैं - ‘आवारा’ ‘दो बीघा जमींन’, ‘श्री 420’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘संगम’, ‘ आह’, ‘ सीमा’, ‘मधुमती’, ‘जागते रहो’, ‘गाइड’, ‘काला बाजार’, ‘बूट पालिस’, ‘यहूदी’, ‘अनाड़ी’,‘पतिता’, ‘दाग’, ‘मेरी सूरत तेरी आंखें’, ‘बंदिनी’, ‘गुमनाम’ और ‘तीसरी कसम’ आदि शामिल हैं। ऐसी ही न जाने कितनी फिल्में होंगी जो आज भी अपनी पहचान सिर्फ गीतों, संगीत के कारण चर्चा में हैं।
शैलेन्द्र न सिर्फ सफल गीतकार थे बल्कि वे एक अभिनेता, संवाद लेखक और फिल्म निर्माता भी रहे हैं। उन्होंने पहला गीत ‘बरसारत में हमसे मिले तुम सजन’ फिल्म बरसात, 1949 में लिखा था। इसके बाद एक से बढ़कर एक गीत लिखने का सिलसिला शुरू हुआ। जब भी रेडियो या टीवी पर आपका लिखा गाना बजता है या सुनाई पड़ता है तो अनायास ही वाह क्या बात है! निकल जाता है। इसीलिए तो आपको तीन बार गीतों के लिए ‘फिल्म फेयर अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। आपका लिखा प्रसिद्ध गीत ‘ये मेरा दीवाना पन है’ फिल्म ‘यहूदी’ का है जो वर्ष 1958 रिलीज हुई थी। इसी प्रकार फिल्म ‘अनाड़ी’ का गीत , ‘सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी’ प्रसिद्ध रहा। यह फिल्म ‘अनाड़ी’, 1959) में बनकर तैयार हुई थी।, ‘मैं गाऊं तुम सो जाओ (फिलम ‘ब्रह्मचारी’ 1968)। इन गीतों के लिए फिल्म फेयर अवार्ड से आपको नबाजा गया।
आपने हर स्तर के गीत लिखे। देशप्रेम, प्रेमगीत, विरह गीत और भारतीय कला-संस्कृति आदि का आपने हमेशा ख्याल रखा। आपने ‘सपनों का सौदागर’ नामक फिल्म के लिए अंतिम गीत ‘तुम प्यास से देखो’ लिखा था। गीत लिखने के साथ-साथ आपको अभिनय का शौक भी था। आपने फिल्म ‘नया घर’, ‘बूट पालिस’, ‘श्री 420’ और ‘मुसाफिर’ गीत तो लिखे ही साथ ही इनमें आपने गजब का अभिनय भी किया। इतना ही नहीं उन्होंने फिल्म ‘परख’ के लिए संवाद भी लिखे थे। आपका प्रथम काव्य संग्रह ‘न्यौता और चुनौती’(1955) में प्रकाशित हुआ था। एक साहित्यकार, कलाकार, कवि के रूप में कार्य करते हुए आपने फिल्मी दुनिया में जो स्थान हासिल किया है, वह अपने आप में एक मिशाल है।
शैलेन्द्र जी ने फिल्म वर्ष 1955 में ‘श्री 420’ के लिए जो गीत लिखा वह आज भी लोगों की जुबान पर है। इस गीत को मुकेश ने गाया था और इसका संगीत दिया था शंकर जय किशन ने। शैलेन्द्र जी फिल्म ‘तीसरी कसम’ के निर्माता एवं गीतकार स्वयं थे। यह उनकी अंतिम फिल्म थी, जिसे आपने वर्ष 1966 में बनाई थी। इस फिल्म को राष्ट्रपति के स्वर्णपदक से भी सम्मानित किया गया। लेकिन शुरू में जब आपको यह पता चला कि उनकी यह फिल्म पूरी तरह से फ्लॉप हो गई है तो उन्हें दिल का दौरा पड़ा और 14 दिसम्बर वर्ष 1966 को सदा-सदा के लिए इस दुनिया को बिलखते हुए छोड़ दिया। आपके जाने के बाद यह फिल्म सुपरहिट रही। लेकिन आपने वह सुख का अनुभव नहीं किया जिसकी आपको चाह थी। आपके परिवार में पत्नी श्रीमती शकुन शैलेन्द्र, बेटा शैली शैलेन्द्र उर्फ मंटू, बबलू शैलेन्द्र. हैं।
प्रसिद्ध अभिनेता राजकूपर को बुलंदियों पर पहुंचाने वाले और कोई नहीं बल्कि शैलेन्द्र जी के लिखे गीत ही थे। एक ओर उनके लिखे गीतों ने न सिर्फ भारत बल्कि रूस और यूरोप के बहुत से देशों में श्री राजकपूर को प्रसिद्धि दिलाई। एक प्रकार से वे भारत के राजदूत के रूप में जाने जाते रहे। वहीं दूसरी ओर गीतकार शैलेन्द्र के गीत भारतीय सभ्यता और संस्कृतिक के संदेश बनकर उन देशों में फैल गए। गीतकार शैलेन्द्र भारतीय संस्कृति एवं विचारधारा के संवाहक थे। उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से समतामूलक भारतीय समाज के निर्माण के लिए मानवतावादी विचारधारा को अपने गीतों से देष-विदेष के वातावरण को गुजायित किया।’’
‘दबे-कुचले लोगों की आवाज को बुलंद करने के लिए दलित प्रतिभापुंज शैलेन्द्र ने नारा दिया था-‘‘हर जोर-जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है।’’ यह नारा आज भी हर मजदूर के लिए मिषाल के समान है, जो अपने अधिकारों की बात करता है।
फिल्मी दुनिया में अकेले शैलेन्द्र ही ऐसे गीतकार हुए हैं जिन्हांेंने अपनी योग्यता और प्रतिभा का लोहा मनवाया। इसी के आधार पर हम अपनी हिस्सेदारी की बात करते हैं। हर वर्ष हजारों फिल्में बनती हैं और करोड़ों रूपए का व्यापार भी होता है। यहां दलितों की भागेदारी कितनी है? हीरो, हीरोइन, निर्देषक, निर्माता, गायक, गीतकार, संगीतकार, नृत्य निर्देषक आदि में दलितों की कितनी संख्या है? क्या इस देष की इतनी बड़ी आबादी में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जो इस क्षेत्र में अपनी पहचान बना पाता? जाहिर है उन्हें यहां कभी अवसर नहीं नहीं मिला। यदि मिलता तो वे गीतकार शैलेन्द्र की भांति अपनी योग्यता और प्रतिभा का सदैव बेहतर प्रदर्षन करते। कहीं न कहीं इसके पीछे जातिवाद का भूत उनका पीछा नहीं छोड़ता।
गीतकार शैलेन्द्र के गीतों में काफी दर्द था। उन्होंने इस देश की जातीय, सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था का गहन चिंतन और अध्ययन के साथ-साथ स्वयं आत्मसात किया था। वे दर्द से बिलखते हुए व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कराहट देखना चाहते थे। वे झूठ बोलने वाले, चोरी करने वाले, अन्याय और शोषण करने वालों को सदैव अपनी कलम के माध्यम से आगाह करते रहे। एक मजदूर एक असहाय को क्या चाहिए उसे खाने-पीने के साथ-साथ सम्मान के साथ जीने का अधिकार चाहिए। ऐसा गीतकार, साहित्यकार हमारे बीच में आज नहीं हैं लेकिन उनकी यादें आज भी लोगों की जुबान पर अनायास आ ही जातीं हैं।
एक दलित परिवार में जन्में ऐसे महान विभूति को न तो भारत सरकार एवं राज्य सरकारों ने कोई महत्व दिया बल्कि स्वयं दलित समाज ने भी उन्हें भुला दिया। उन्हें सही मायने में भारत रत्न जैसे पुरस्कार से सम्माननित किया जाना चाहिए था। उनके नाम से डाक टिकट भी जारी हो, उनके नाम से स्मारक, पुरस्कार आदि की शुरूआत होनी चाहिए। इसके लिए हम प्रयासरत हैं। आज की फिल्मी दुनिया में दलितों की कितनी संख्या है, उनके बारे में लोग जानने को उत्सुक होते हैं। यह शोध का विषय है, इस पर भी शोधकार्य हो रहा है। फिल्मी दुनिया में दलित समाज की प्रतिभाओं को उचित अवसर मिलें, सुविधाएं मिले इस दिशा में में हमारा प्रयास जारी है। उनके जन्म दिवस एवं देहांत के अवसर पर यदि हम उन्हें याद करते हुए उनके गीतों के संदेशों, विचारों और चिंतन को आत्मसात् करें तो मैं समझता हूं कि यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
गीतकार शैलेन्द्र भारत के सच्चे रत्न थे
आलेख- के पी मौर्य, महासचिव, शैलेन्द्र सांस्कृतिक केन्द्र
फिल्मी दुनिया के प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र के लिखे गीतों को सुनकर भारत ही नहीं बल्कि विश्व में आज भी लोग मस्त होकर झूमते हुए दिखाई देते हैं। उनके गीत लोगों के दिलो-दिमाग पर आज भी अपनी स्पष्ट छाप छोड़ जाते हैं। एक दलित परिवार में जन्में गीतकार शैलेन्द्र जी को प्रसिद्ध अभिनेता श्री राजकपूर उनकी प्रतिभा और गीतों से प्रभावित होकर उनको फिल्मी दुनिया में लेकर आए। शैलेन्द्र जी ने अपनी प्रतिभा और योग्यता के बल पर अपनी गीत लिखने की शैली से न सिर्फ श्री राजकपूर को ख्याति दिलाई बल्कि अपने गीतों के माध्यम से भारत की छबि को दुनिया में उभारने में क्रांतिकारी भूमिका निभाई। फिल्मी दुनिया में उनकी मंडली में अभिनेता राजकपूर, संगीतकार शंकर जयकिषन और गायक मुकेष कुमार आदि थे।
शैलेन्द्र का असली नाम शंकर सिंह ‘शैलेन्द्र’ था। उनका जन्म 30 अगस्त, 1923, रावल पिंडी पाकिस्तान में एक दलित परिवार में हुआ था। आपने 171 हिन्दी फिल्मों एवं 6 भोजपुरी फिल्मों में लगभग 800 फिल्मी गीत लिखे। आपने जिन लोकप्रिय फिल्मों में के लिए गीत लिखे उनमें प्रमुख हैं - ‘आवारा’ ‘दो बीघा जमींन’, ‘श्री 420’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’, ‘संगम’, ‘ आह’, ‘ सीमा’, ‘मधुमती’, ‘जागते रहो’, ‘गाइड’, ‘काला बाजार’, ‘बूट पालिस’, ‘यहूदी’, ‘अनाड़ी’,‘पतिता’, ‘दाग’, ‘मेरी सूरत तेरी आंखें’, ‘बंदिनी’, ‘गुमनाम’ और ‘तीसरी कसम’ आदि शामिल हैं। ऐसी ही न जाने कितनी फिल्में होंगी जो आज भी अपनी पहचान सिर्फ गीतों, संगीत के कारण चर्चा में हैं।
शैलेन्द्र न सिर्फ सफल गीतकार थे बल्कि वे एक अभिनेता, संवाद लेखक और फिल्म निर्माता भी रहे हैं। उन्होंने पहला गीत ‘बरसारत में हमसे मिले तुम सजन’ फिल्म बरसात, 1949 में लिखा था। इसके बाद एक से बढ़कर एक गीत लिखने का सिलसिला शुरू हुआ। जब भी रेडियो या टीवी पर आपका लिखा गाना बजता है या सुनाई पड़ता है तो अनायास ही वाह क्या बात है! निकल जाता है। इसीलिए तो आपको तीन बार गीतों के लिए ‘फिल्म फेयर अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। आपका लिखा प्रसिद्ध गीत ‘ये मेरा दीवाना पन है’ फिल्म ‘यहूदी’ का है जो वर्ष 1958 रिलीज हुई थी। इसी प्रकार फिल्म ‘अनाड़ी’ का गीत , ‘सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी’ प्रसिद्ध रहा। यह फिल्म ‘अनाड़ी’, 1959) में बनकर तैयार हुई थी।, ‘मैं गाऊं तुम सो जाओ (फिलम ‘ब्रह्मचारी’ 1968)। इन गीतों के लिए फिल्म फेयर अवार्ड से आपको नबाजा गया।
आपने हर स्तर के गीत लिखे। देशप्रेम, प्रेमगीत, विरह गीत और भारतीय कला-संस्कृति आदि का आपने हमेशा ख्याल रखा। आपने ‘सपनों का सौदागर’ नामक फिल्म के लिए अंतिम गीत ‘तुम प्यास से देखो’ लिखा था। गीत लिखने के साथ-साथ आपको अभिनय का शौक भी था। आपने फिल्म ‘नया घर’, ‘बूट पालिस’, ‘श्री 420’ और ‘मुसाफिर’ गीत तो लिखे ही साथ ही इनमें आपने गजब का अभिनय भी किया। इतना ही नहीं उन्होंने फिल्म ‘परख’ के लिए संवाद भी लिखे थे। आपका प्रथम काव्य संग्रह ‘न्यौता और चुनौती’(1955) में प्रकाशित हुआ था। एक साहित्यकार, कलाकार, कवि के रूप में कार्य करते हुए आपने फिल्मी दुनिया में जो स्थान हासिल किया है, वह अपने आप में एक मिशाल है।
शैलेन्द्र जी ने फिल्म वर्ष 1955 में ‘श्री 420’ के लिए जो गीत लिखा वह आज भी लोगों की जुबान पर है। इस गीत को मुकेश ने गाया था और इसका संगीत दिया था शंकर जय किशन ने। शैलेन्द्र जी फिल्म ‘तीसरी कसम’ के निर्माता एवं गीतकार स्वयं थे। यह उनकी अंतिम फिल्म थी, जिसे आपने वर्ष 1966 में बनाई थी। इस फिल्म को राष्ट्रपति के स्वर्णपदक से भी सम्मानित किया गया। लेकिन शुरू में जब आपको यह पता चला कि उनकी यह फिल्म पूरी तरह से फ्लॉप हो गई है तो उन्हें दिल का दौरा पड़ा और 14 दिसम्बर वर्ष 1966 को सदा-सदा के लिए इस दुनिया को बिलखते हुए छोड़ दिया। आपके जाने के बाद यह फिल्म सुपरहिट रही। लेकिन आपने वह सुख का अनुभव नहीं किया जिसकी आपको चाह थी। आपके परिवार में पत्नी श्रीमती शकुन शैलेन्द्र, बेटा शैली शैलेन्द्र उर्फ मंटू, बबलू शैलेन्द्र. हैं।
प्रसिद्ध अभिनेता राजकूपर को बुलंदियों पर पहुंचाने वाले और कोई नहीं बल्कि शैलेन्द्र जी के लिखे गीत ही थे। एक ओर उनके लिखे गीतों ने न सिर्फ भारत बल्कि रूस और यूरोप के बहुत से देशों में श्री राजकपूर को प्रसिद्धि दिलाई। एक प्रकार से वे भारत के राजदूत के रूप में जाने जाते रहे। वहीं दूसरी ओर गीतकार शैलेन्द्र के गीत भारतीय सभ्यता और संस्कृतिक के संदेश बनकर उन देशों में फैल गए। गीतकार शैलेन्द्र भारतीय संस्कृति एवं विचारधारा के संवाहक थे। उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से समतामूलक भारतीय समाज के निर्माण के लिए मानवतावादी विचारधारा को अपने गीतों से देष-विदेष के वातावरण को गुजायित किया।’’
‘दबे-कुचले लोगों की आवाज को बुलंद करने के लिए दलित प्रतिभापुंज शैलेन्द्र ने नारा दिया था-‘‘हर जोर-जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है।’’ यह नारा आज भी हर मजदूर के लिए मिषाल के समान है, जो अपने अधिकारों की बात करता है।
फिल्मी दुनिया में अकेले शैलेन्द्र ही ऐसे गीतकार हुए हैं जिन्हांेंने अपनी योग्यता और प्रतिभा का लोहा मनवाया। इसी के आधार पर हम अपनी हिस्सेदारी की बात करते हैं। हर वर्ष हजारों फिल्में बनती हैं और करोड़ों रूपए का व्यापार भी होता है। यहां दलितों की भागेदारी कितनी है? हीरो, हीरोइन, निर्देषक, निर्माता, गायक, गीतकार, संगीतकार, नृत्य निर्देषक आदि में दलितों की कितनी संख्या है? क्या इस देष की इतनी बड़ी आबादी में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जो इस क्षेत्र में अपनी पहचान बना पाता? जाहिर है उन्हें यहां कभी अवसर नहीं नहीं मिला। यदि मिलता तो वे गीतकार शैलेन्द्र की भांति अपनी योग्यता और प्रतिभा का सदैव बेहतर प्रदर्षन करते। कहीं न कहीं इसके पीछे जातिवाद का भूत उनका पीछा नहीं छोड़ता।
गीतकार शैलेन्द्र के गीतों में काफी दर्द था। उन्होंने इस देश की जातीय, सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था का गहन चिंतन और अध्ययन के साथ-साथ स्वयं आत्मसात किया था। वे दर्द से बिलखते हुए व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कराहट देखना चाहते थे। वे झूठ बोलने वाले, चोरी करने वाले, अन्याय और शोषण करने वालों को सदैव अपनी कलम के माध्यम से आगाह करते रहे। एक मजदूर एक असहाय को क्या चाहिए उसे खाने-पीने के साथ-साथ सम्मान के साथ जीने का अधिकार चाहिए। ऐसा गीतकार, साहित्यकार हमारे बीच में आज नहीं हैं लेकिन उनकी यादें आज भी लोगों की जुबान पर अनायास आ ही जातीं हैं।
एक दलित परिवार में जन्में ऐसे महान विभूति को न तो भारत सरकार एवं राज्य सरकारों ने कोई महत्व दिया बल्कि स्वयं दलित समाज ने भी उन्हें भुला दिया। उन्हें सही मायने में भारत रत्न जैसे पुरस्कार से सम्माननित किया जाना चाहिए था। उनके नाम से डाक टिकट भी जारी हो, उनके नाम से स्मारक, पुरस्कार आदि की शुरूआत होनी चाहिए। इसके लिए हम प्रयासरत हैं। आज की फिल्मी दुनिया में दलितों की कितनी संख्या है, उनके बारे में लोग जानने को उत्सुक होते हैं। यह शोध का विषय है, इस पर भी शोधकार्य हो रहा है। फिल्मी दुनिया में दलित समाज की प्रतिभाओं को उचित अवसर मिलें, सुविधाएं मिले इस दिशा में में हमारा प्रयास जारी है। उनके जन्म दिवस एवं देहांत के अवसर पर यदि हम उन्हें याद करते हुए उनके गीतों के संदेशों, विचारों और चिंतन को आत्मसात् करें तो मैं समझता हूं कि यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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